Wednesday, December 20, 2023

मुक्तक

यह मेरा है,यह मेरा है, यहीं पर सब उलझ जाता करें फिर कोशिशें कितनी,नहीं कुछ भी सुलझ पाता। अहम संतुष्ट करने को गुनाह क्या-क्या नहीं करते अहम को जीत लें गर हम तभी सच भी समझ आता।। - डॉ रमा द्विवेदी

क्षणिका

मैं बूंद हूँ तो क्या मैं खुद को आजमाने का हौसला रखती हूँ इसलिए तो विशाल समंदर से खुद ही मिलती हूँ। - डॉ रमा द्विवेदी

मुक्तक

बहुत खुशहालियों में भी कभी मगरूर मत होना जीत का ताज सिर पर हो कभी मजबूर मत होना। ऊंचाई व्योम हो लेकिन ज़मीं को भूल जाना मत तुम अपनी कामयाबी में नशे से चूर मत होना।। - डॉ रमा द्विवेदी

मैं द्रौपदी नहीं हूं - परिचर्चा संपन्न

``मैं द्रौपदी नहीं हूँ ''पुस्तक परिचर्चा संपन्न -युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच =====================================================...