Wednesday, December 20, 2023

मुक्तक

यह मेरा है,यह मेरा है, यहीं पर सब उलझ जाता करें फिर कोशिशें कितनी,नहीं कुछ भी सुलझ पाता। अहम संतुष्ट करने को गुनाह क्या-क्या नहीं करते अहम को जीत लें गर हम तभी सच भी समझ आता।। - डॉ रमा द्विवेदी

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मैं द्रौपदी नहीं हूं - परिचर्चा संपन्न

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