Saturday, February 10, 2024
मैं द्रौपदी नहीं हूं - परिचर्चा संपन्न
``मैं द्रौपदी नहीं हूँ ''पुस्तक परिचर्चा संपन्न -युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच
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युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच (पंजीकृत न्यास) आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना राज्य शाखा की वर्चुअल चौदहवीं संगोष्ठी 28 जनवरी - 2024 ( रविवार ) 3. 30 बजे से आयोजित की गई ।
डॉ. रमा द्विवेदी (अध्यक्ष, आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना राज्य शाखा ) एवं महासचिव दीपा कृष्णदीप ने संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि डॉ रमा द्विवेदी कृत ``मैं द्रौपदी नहीं हूँ '' लघुकथा संग्रह की परिचर्चा प्रख्यात चिंतक प्रो ऋषभदेव शर्मा जी की अध्यक्षता में संपन्न हुई | बतौर विशिष्ट अतिथि प्रखर व्यंग्यकार श्री रामकिशोर उपाध्याय जी , प्रख्यात युवा साहित्यकार डॉ राशि सिन्हा जी मंचासीन हुए | सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री अवधेश कुमार सिन्हा जी , सुविख्यात युवा साहित्यकार प्रवीण प्रणव जी एवं प्रख्यात समीक्षक डॉ जयप्रकाश तिवारी जी बतौर विशेष आमंत्रित अतिथि उपस्थित रहे |
कार्यक्रम का शुभारंभ दीपा कृष्णदीप द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना के साथ हुआ। तत्पश्चात अध्यक्षा डॉ रमा द्विवेदी ने अतिथियों का परिचय दिया एवं शब्द पुष्पों से अतिथियों का स्वागत किया| संस्था का परिचय देते हुए कहा कि यह एक वैश्विक संस्था है जो हिंदी साहित्य के प्रचार -प्रसार के साथ अन्य सभी भाषाओं के संवर्धन हेतु कार्य करती है | वरिष्ठ साहित्यकारों के विशिष्ठ साहित्यिक योगदान हेतु उन्हें हर वर्ष पुरस्कृत करती है| युवा प्रतिभाओं को मंच प्रदान करना , प्रोत्साहित करना एवं उन्हें सम्मानित करना भी संस्था का एक विशेष उद्देश्य है |
``मैं द्रौपदी नहीं हूँ '' लघुकथा संग्रह की परिचर्चा में प्रकाश डालते हुए मुख्य वक्ता डॉ राशि सिन्हा ने कहा कि ``मैं द्रौपदी नहीं हूॅं'', लघुकथा संग्रह में शीर्षक लघुकथा के माध्यम से आधुनिक संदर्भ में, स्त्री-चेतना के तहत मिथकीय चरित्र द्रौपदी के माध्यम से, ऐतिहासिकता और पौराणिकता को समेटते हुए , देह मुक्ति से आत्म मुक्ति तक का मार्ग तय करने में लेखिका रमा द्विवेदी जी ने द्रौपदी में अंतर्निहित सभी मानवीय तत्वों के योग में से जिस एक बिंदु को केंद्रीकृत कर , सांकेतिक रूप में अभिव्यंजित किया है,वह सच में लघुकथा के मूल स्वर को तीव्रता प्रदान करती है। साथ ही, आधुनिक युग में व्याप्त विडंबनाओं, विसंगतियों पर प्रहार करते हुए उन्होंने देश और समाज की भटकती सामाजिक-सांस्कृतिक चेतनाओं के साथ साहित्य में बढ़ती उपभोक्तावादी संस्कृति को समेट कर , विविध पक्षों के सत्य के उद्घाटन में जो अर्थ तीव्रता का प्रयोग किया है वह निश्चित रूप से प्रणम्य है एवं प्रशंसनीय है। समाज के हर कोने में उत्पन्न अंतर्विरोध की स्थितियों को , बदलते मूल्यों को सांकेतिक व्यंजनाओं के माध्यम से वर्तमान विसंगतियों में व्याप्त अलग स्वायत्त सत्ता तलाशने की युवा पीढ़ी की एकाकी जीवन धारा की सोच और समर्पण को पूरी अर्थ तीव्रता के साथ प्रस्तुत करता यह लघुकथा संकलन निश्चित रूप से क्षरण हो रहे मानवीय मूल्यों के पुनर्स्थापन की कोशिश है जिसमें लेखिका डॉ.रमा द्विवेदी `` मैं द्रौपदी नहीं हूँ '' लघुकथा संग्रह के सभी आयामों के साथ न्याय करने में सफल हुई हैं। ''
विशिष्ट अतिथि एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष रामकिशोर उपाध्याय जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि “मैं द्रौपदी नहीं हूँ” संग्रह जीवन के विभिन्न सरोकारों से जुड़ी एक सौ ग्यारह लघुकथाओं का पुष्पगुच्छ है जिसमें कथाकार डॉ रमा द्विवेदी ने घटना अथवा व्यक्ति से जुड़े एक क्षण का चित्रण सार रूप में बड़े ही कलात्मक ढंग से बहुत कम शब्दों में प्रस्तुत किया है | प्रस्तुत संग्रह की लघुकथाओं में उनकी गहरी संवेदनशीलता, तीव्र बुद्धि और घटनाओं के सूक्ष्म निरीक्षण-क्षमता का परिचय मिलता है जो लघुकथाकार का एक आवश्यक गुण भी है | एक कथाकार को लोक और शास्त्र का समुचित ज्ञान होना चाहिए | इस संग्रह की शीर्षक लघु कथा ‘मैं द्रौपदी नहीं हूँ’ जैसी कई लघुकथाओं को पढ़कर हमें उनके इस पक्ष का पता चलता है | उनकी लघुकथाएँ किसी समाधान की ओर नहीं बढ़ती बल्कि पाठकों को उनके विवेकाधिकारित निष्कर्ष पर छोड़ती दिखाई देती हैं | उनकी लघुकथायें जीवन के कटु यथार्थ को चित्रित करती हैं | यही बात डॉ रमा द्विवेदी को विशेष बनाती है | कुल मिला कर उनका लघुकथा लेखन का प्रथम प्रयास प्रशंसनीय है |''
विशेष आमंत्रित अतिथि एवं परामर्शदाता अवधेश कुमार सिन्हा जी ने कहा कि- `` मैं द्रौपदी नहीं हूँ '' लघुकथा संग्रह उनके पूर्व में प्रकाशित काव्यसंग्रहों `दे दो आकाश' और `रेत का समंदर' का अगला विस्तार है| संग्रह की शीर्षक कथा भारतीय स्त्री की स्वतंत्र चेतना एवं आत्म रक्षण का उद्घोष है | कथाकार ने घर- परिवार एवं समाज की विसंगतियों एवं विद्रूपताओं के अपने अनुभवों को बड़े ही रचनात्मक ढंग से संग्रह की कथाओं में चित्रित किया है |''
विशेष आमंत्रितअतिथि एवं परामर्शदाता प्रवीण प्रणव जी ने संग्रह की अधिकांश कथाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि `` मैं द्रौपदी नहीं हूँ '' संग्रह की पहली शीर्षक कहानी ही इस संग्रह की कहानियों के विषय तय कर देती है। स्त्री आज भी अपने घर की चारदीवारी के अंदर भी सुरक्षित नहीं है | शीर्षक कथा की नायिका अपने सम्मान की रक्षा के लिए आवाज उठाती है| इस संग्रह का शीर्षक उपयुक्त है | कथानकों में विषय वैविध्य है | समाज के विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त नैतिक मूल्यों का क्षरण एवं अन्य आधुनिक विषयों का चित्रण इस संग्रह में किया गया जो इस संग्रह को प्रासंगिक बनाता है| ''
विशेष आमंत्रित अतिथि डॉ जयप्रकाश तिवारी जी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि - ``डॉ रमा द्विवेदी हिन्दी साहित्य जगत की अत्यंत संवेदनशील रचनाकार और समस्या संप्रेषण की अद्भुत शब्द-सर्जक हैं। वे मर्म पर प्रहार करती हैं और पाठक को सोचने पर विवश करती हैं। इन लघुकथाओं में डॉ रमा जी का बहुआयामी व्यक्तित्व निखर गया है| कहीं वे समाजशास्त्री लगती है, कहीं मनोवैज्ञानिक, कहीं दार्शनिक तो कहीं कक्षा में अध्यापन करती शिक्षिका। कुछ लघुकथाओं में वे समाधान की ओर संकेत करती हैं तो कुछ समस्याओं का समाधान पाठक और समाज के लिए छोड़ देती हैं । मानव- मन की पिपासा धन और भोग से शांत नहीं होती। साहित्यिक संस्थाओं का विकृत होते स्वरूप को उभार कर एवं झन्नाटेदार तमाचा जड़कर रमा द्विवेदी जी साहित्य जगत के लिए स्तुत्य और दुलारी बन गई हैं । गौरतलब है कि उनका कुरीतियों से पनपती नवीन विकृतियों पर उनका चुटीला प्रहार सामाजिक उत्कर्ष और कल्याण के लिए है, विध्वंस के लिए नहीं।''
परिचर्चा के अध्यक्ष प्रो ऋषभदेव शर्मा जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सभी वक्तव्यों के सारांश पर अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणी देते हुए कहा कि `` महाश्वेता देवी , प्रतिभा राय से लेकर मंटों तक के समकक्ष रखकर इस संग्रह की कथाओं को रखकर वक्ताओं ने देखा-परखा है और यह लेखिका के लिए चुनौतीपूर्ण दायित्व बन गया है लेकिन यही उनकी उपलब्धि भी है | संग्रह का सामाजिक पक्ष बड़ा प्रबल है | लेखिका अनेक कथाओं में क्रूर अमानवीयता को उभारती हैं | परिचर्चा में शीर्षक कथा बहुत चर्चित रही | द्रौपदी एक पौराणिक महावृतांत है जो सहज उपलब्ध है लेकिन इसके कई खतरे भी हैं | लेखिका ने यह खतरा मोल लिया है और नायिका का एक वाक्य ने ही इसे सार्थक बना दिया है | संग्रह की अधिकांश कहानियाँ इस महावृतान्त से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से टकराती हैं और लेखिका कभी पक्ष में और कभी विपक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं| यद्यपि गद्य में लेखिका का यह प्रथम प्रयास है लेकिन परिपक्व रचनाकार की परिपक्व रचना कृति है |'' उन्होंने सफल लेखन के लिए लेखिका डॉ रमा द्विवेदी को शुभकामनाएँ दीं|
तत्पश्चात काव्य गोष्ठी आयोजित की गई | उपस्थित रचनाकारों ने विविध विषयों पर सृजित सुंदर -सरस रचनाओं का काव्य पाठ करके वातावरण को खुशनुमा बना दिया। विनीता शर्मा(उपाध्यक्ष ) ,डॉ सुरभि दत्त (संयुक्त सचिव) , शिल्पी भटनागर , दर्शन सिंह ,डॉ सुषमा देवी ,श्री रामकिशोर उपाध्याय , डॉ राशि सिन्हा, भगवती अग्रवाल ,सरिता दीक्षित ,डॉ रमा द्विवेदी, ममता महक (कोटा) डॉ संजीव चौधरी (जयपुर ) डॉ जयप्रकाश तिवारी (लखनऊ) ,डॉ संगीता शर्मा, शशि राय (गाजीपुर) इंदु सिंह , डॉ स्वाति गुप्ता ,दीपा कृष्णदीप तथा प्रो ऋषभदेव शर्मा जी ने अध्यक्षीय काव्य पाठ किया |
पूजा महेश,डॉ आशा मिश्रा , रामनिवास पंथी ( रायबरेली) अवधेश कुमार सिन्हा , प्रवीण प्रणव ,भावना पुरोहित, किरण सिंह ,तृप्ति मिश्रा , डॉ पी के जैन ,डॉ जी नीरजा ,डॉ मंजू शर्मा , पूनम झा ,ऋषि सिन्हा ने कार्यक्रम में उपस्थिति दर्ज की |
प्रथम सत्र का संचालन शिल्पी भटनागर (संगोष्ठी संयोजिका ) द्वितीय सत्र का संचालन दीपा कृष्णदीप (महासचिव ) ने किया | डॉ संगीता शर्मा (मीडिया प्रभारी )के आभार प्रदर्शन से कार्यक्रम समाप्त हुआ |
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प्रेषक डॉ रमा द्विवेदी ,अध्यक्ष /युवा उत्कर्ष
फोन :9849021742
मुक्तक: प्रेम पत्र
मुक्तक
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ये मेरे प्रेम पत्र अगर तुम्हारे नाम नहीं होते
तो दुनिया में कभी हम इतने बदनाम नहीं होते।
कितनी दुश्वारियों को भी हमने गले लगाया है
फिर भी कभी कम तेरे इल्ज़ाम नहीं होते।।
*डॉ. रमा द्विवेदी*
साहित्य कुंज में प्रकाशित समीक्षा
https://sahityakunj.net/entries/view/vartman-samay-ka-tazkira-main-draupadi-nahin-huun
Friday, February 9, 2024
मैं द्रौपदी नहीं हूं- परिचर्चा
https://vivratidarpan.com/Entertainment/i-am-not-draupadi-dr-rashi-sinha/cid13506058.htm
Friday, February 2, 2024
मैं द्रौपदी नहीं हूं- समीक्षा
*पुस्तक -समीक्षा *
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पुस्तक: मैं द्रौपदी नहीं हूँ
विधा: लघुकथा संग्रह
रचनाकार: डॉ रमा द्विवेदी, हैदराबाद ( तेलंगाना )
प्रकाशक: शब्दांकुर प्रकाशन, नई दिल्ली।
प्रकाशन वर्ष: 2022
समीक्षक: डॉ जयप्रकाश तिवारी, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
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डॉ रमा द्विवेदी हिन्दी साहित्य जगत में *नारी सशक्तिकरण* की एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। नारी सशक्तिकरण आंदोलन में उनका चिंतन हिन्दी साहित्य को लगातार समृद्ध कर रहा है। इस पुस्तक के पूर्व मैने उनका काव्य संग्रह *रेत का समन्दर* और हाइकु संग्रह *साँसों की सरगम* का न केवल पाठक रहा हूँ बल्कि उनकी गुणवत्ता और उपादेयता से प्रभावित होकर उनकी समीक्षा भी लिखी है। आज उनकी नई प्रकाशित कथा संग्रह *मैं द्रौपदी नहीं हूँ * मेरे हाथों में है और कथानक का "भाव चिंतन" मन - मस्तिष्क दोनों को निरंतर मथता ही जा रहा है। इस संग्रह में कुल 111 संवेदनशील लघुकथाओं को स्थान मिला है। साहित्यिक धर्म का पालन करते हुए प्रत्येक कथानक में किसी न किसी सामाजिक समस्या, कुप्रथा को न केवल प्रमुखता से उठाया उठाया गया है अपितु उसका सशक्त विरोध / समुचित सबल प्रत्युत्तर, समाधान भी दिया गया है। अधिकांश शोषित पात्र कोई न कोई नारी चरित्र ही है और यह चरित्र अपने ही आस पास की "नारी" है। वर्तमान की नारी उस पुरातन भेदभाव, शोषण, तिरस्कार, या सामाजिक असमानता, विद्रूपताओं का समुचित प्रत्युत्तर देती है, इन तीखे किंतु सार्थक प्रत्युत्तरो में तन, मन और कर्म तीनों से एक प्रगतिशील नारी जगत, सशक्त नारी चरित्र को नए नए संदर्भों, परिवेश में प्रकट होता है वह वृत्ति कोरी कल्पना नहीं है, प्रायः आज वह दिखता भी है।
प्रथम कथानक की नायिका *प्रज्ञा* परिवार में ही कामुक दृष्टि रखने वाले देवर का न केवल विरोध करती है, अपितु पति द्वारा इन शिकायतों पर ढुलमुल रवैया अपनाए जाने पर प्रज्ञा का दो टूक साहसी निर्णय - "मैं द्रौपदी नहीं हूँ , जो तुम्हारे कहने से दांव पर लग जाऊँगी। मैं अपने आत्म सम्मान की रक्षा स्वयं करूँगी" का लघु वाक्य *मै द्रौपदी नहीं हूँ * न केवल इस कथा का, अपितु इस पुस्तक का भी सारगर्भित शीर्षक बन गया है।
सामाजिक विकृतियों को तो डॉ रमा जी ने उठाया ही है, साहित्यिक विद्रूपताओं और नित्य बढ़ते नकली साहित्यकारों की ओछी और लोलुप प्रवृत्ति को जिस मुखरता से चिह्नित कर प्रस्तुत किया गया है, उस प्रस्तुति कला ने एक पाठक और समीक्षक की दृष्टि से मुझे बहुत गहराई तक प्रभावित किया है। साहित्यक सृजन, "साहित्यिक सम्मान और उपाधि", सम्मान और पुरस्कार से विभूषित होना, धनवानों या धनकुबेरों की "लक्ष्मी" नहीं है जो उलूक पर यत्र -तत्र विचरण करता रहता है; ये सम्मान तो कलमकारों और चिंतकों की "सरस्वती" का वह राजहंस है जो नीर क्षीर का विवेक करता है, जो तप:पूत लेखनी से प्रसूत होता है। यह अर्थ का विषय नहीं, संवेदना और अभिव्यक्ति का विषय है। यह संवेदनात्मक कठिन साधना का पाथेय है। यह कोई क्रय विक्रय की वस्तु नहीं। कवि बनने - बनाने की लालसा में कवित्व के लोभी व्यक्ति और मानद उपाधि बाँटने वाली इन कुटिल साहित्यिक संस्थाओं पर, इस अद्यतन कुप्रथा पर डॉ रमा जी ने एक बार नहीं, कई बार अलग अलग ढंग से जिस प्रकार प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया है, उसके लिए वह पूरे साहित्य जगत की दुलारी नेत्री बन गई हैं। साहित्य जगत की यह बढ़ती कुप्रथा `ठगुआ कवि', `लोभी गुरु, लालची चेला', `मानद उपाधि', `धंधा', `शिक्षा शिरोमणि, `लक्ष्मी की माया' ... आदि लघुकथाएँ इसी कुप्रथा को चित्रित करती कहानियाँ कपोल कल्पित नहीं, बढ़ती जा रही वास्तविकता की कटु सच्चाई है। जिसपर कथाकार ने करारा तमाचा जड़ा है। यह तमाचा सर्वथा स्तुत्य है।
समलैंगिक विवाह, लिव इन रिलेशनशिप, तलाक, राजनीति, कुटिल राजनीति, घृणित राजनीति, गुणों की दहशत, पारिवारिक घुटन, अंतर्द्वंद , नियति का खेल, खोखली मान्यताएँ , दरकते टूटते पारिवारिक, सामाजिक रिश्ते .... आदि अनेक विषयों को लेकर नारी चरित्र प्रधान कथानकों का सृजन किया है जहाँ स्त्री ने अपने आत्म सम्मान, आत्म गौरव, अपनी रुचि, अपने अधिकार और अपने कर्तव्य के प्रति सजग, सतर्क और प्रतिबद्ध दिखती है। नारी के इस सबल चरित्र का समादर होना ही चाहिए। ``एक नारी बदलती है तो उसकी संतति बदलती है, संस्कार बदलता है, परिवार बदलता है, संस्कृति बदलती है। किंतु इसी बिंदु पर अत्यंत सतर्कता की आवश्यकता भी है''। `स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में एक पतली सी बहुत महीन सीमा रेखा होती है। स्वतंत्रता उपयोगी है, स्वच्छंदता घातक। संतोष का विषय है कि कथाकार ने इस रेखा का समुचित ध्यान रखा है।' प्रत्येक नारी चरित्र प्रगतिशील और स्वतंत्रता की पोषिका तो है, घातक स्वच्छंदता कहीं नहीं दिखी। इस सावधानी ने साहित्य के क्षेत्र में डॉ रमा द्विवेदी के व्यक्तित्व और लेखकीय चिंतन को एक गरिमामय ऊँचाई प्रदान की है, उसे संस्कृति की पोषिका के रूप में भी स्थापित किया है।
इन सारी अच्छाइयों और उपादेयता के बाद भी मुझे इस पुस्तक का शीर्षक कुछ खटकता है। प्रथम कहानी के रूप में "मैं द्रौपदी नहीं हूँ " तो उपयुक्त है, यह कथा की मांग भी है किंतु समग्र रूप में पुस्तक शीर्षक रूप में मुझे व्यक्तिगत रूप से उपयुक्त नहीं लगता। यह अति उत्साह और इसकी प्रेरक आभा से प्रभावित निर्णय लगता है। क्योंकि `मैं द्रौपदी नहीं हूँ ' यह एक निषेध वाक्य है, यह द्रौपदी के उन सभी उपयोगी, उपादेय, ऊर्जस्वी गुणों का भी निषेध कर देता है जो नारी स्वाभिमान और स्वावलंबन हेतु नितांत अनिवार्य है। नारी सदा से ही संवेदनशील, त्यागी, समर्पिता और चिंतनशील रही है, किंतु मुखर नहीं रही। उसे यह मुखरता प्रदान की है `गार्गी' और `द्रौपदी' ने। कालांतर में `शकुंतला' ... आदि ने। महाराज धृतराष्ट्र के भरे दरबार में पहले अपने शूरवीर पतियों से, दुर्योधन से, भीष्म से, द्रोण और कृप से और अन्त में महाराज धृतराष्ट्र जो युक्तियुक्त संवाद और सामर्थ्य कौशल जो द्रौपदी में है, क्या किसी अन्य स्त्री चरित्र में यह सुलभ है? अपमान के बदला का संकल्प लेना और पूर्ण होने तक दृढ़ रहने का कोई अन्य दूसरा उदाहरण है? कई अवसर आए जब समझौता की संभावना बनी थी किन्तु मूल में यह "द्रौपदी ही थी" जिसका संकल्प पूर्ण हुआ। द्रौपदी अग्नि कुण्ड से उत्पन्न बाला थी, यज्ञसैनी थी। पाँच पतियों का वरण उसका निजी फैसला नहीं था, यह परिस्थितियों की देन थी। उस समय बहुपत्नी और बहुपति विवाह को सामाजिक मान्यता प्राप्त था। यह समसामयिक पारिवारिक संस्कार और मातृ निर्णय की स्वीकृति, आदरभाव था। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाना चाहिए कि वह कामुक थी, कामपिपासु या चरित्रहीन थी। यदि ऐसी होती तो "कीचक बध" क्यों होता? यदि समझौतावादी होती तो दुशासन की छाती का लहू कैसे आता? दुर्योधन का जांघ नियम विरुद्ध भी क्यों टूटता? हाँ , जीवन उसका कंटककीर्ण भले ही रहा, अंत में महारानी, राजमहिशी वही बनी, यह उसकी विजय गाथा है। वह विजयी है, पराभूता नहीं। विरोधियों (विकृतियों) के समूल नाश के केंद्र बिंदु में भी "द्रौपदी" ही सर्वदा विद्यमान है। संकल्प सतत याद रहे इसके लिए उसने केशों को खुला छोड़ दिया था। संकल्प के इस प्रेरक प्रतीक को मध्यकाल में चाणक्य ने अपनाया और नंद वंश का नाश हुआ। इस प्रकार द्रौपदी चरित्र नारी के लिए ही नहीं, पुरुष के लिए भी प्रेरक तत्त्व है। यदि "द्रौपदी" के इन प्रेरक और गतिमान गुणों का ही निषेध कर दिया जाएगा तो आधुनिक सबल नायिका, अद्यतन प्रगतिशील नारी को प्रेरक ऊर्जा, संबल और विचार कहाँ से मिलेगा? द्रौपदी अपनी दिव्य गुणों के कारण भारतीय संस्कृति में पंच कन्याओं में आदर के साथ परिगणित की गई है। वह भारतीय संस्कृति की दिव्य धरोहर है। आज द्रौपदी कोई व्यक्ति वाचक संज्ञा नहीं, गुणवाचक नारी चरित्र है। यह एक ज्योतित, प्रखर और तेजस्वी सांस्कृतिक बिंब बन गया है।
इस पुस्तक में संकलित लघुकथाएँ स्वतंत्रता की मांग, स्वनिर्णय के अधिकार की मांग प्रगतिशीलता, आधुनिकता और "नारी सशक्तिकरण" के नाम पर करते है, इसमें कोई बुराई भी नहीं है; किन्तु क्या इस स्वतंत्रता की कोई सीमा रेखा भी है? स्वतंत्रता की यह मांग भारतीय संस्कृति द्वारा अनुमोदित है या पाश्चात्य सभ्यता द्वारा विकृत? यहाँ मैने "विकृत" शब्द का प्रयोग अनजाने में नहीं, जानबूझकर किया है। क्यों किया है, इसके उत्तर के लिए हमें पाश्चात्य जगत की ओर झांकना होगा। पाश्चात्य जगत में नारी स्वतंत्रता के नाम पर एक आंदोलन उठा और उसे तीव्र धार, तीव्र गति दिया सीमोन दि बाउवा की पुस्तक "द सेकंड सेक्स" ने। (हिंदी रूपांतरण 'स्त्री:उपेक्षिता', अनुवादक, प्रभा खेतान)। सिमोन "नारी स्वतंत्रता आंदोलन" की प्रथम अंतरराष्ट्रीय चेयर पर्सन बनीं थीं । इस आंदोलन की प्रमुख मांग थी स्थापित सामाजिक संस्थाओं का विरोध। इस आंदोलन ने विवाह जैसी संस्थाओं को नकार दिया और बिना विवाह के ही पुरुष मित्र या महिला मित्र के साथ जीवन बिताने के स्वतंत्र निर्णय की एक नई संकल्पना प्रस्तुत की। फलत: 'लिव इन रिलेशनशिप' और 'समलैंगिक विवाह' की प्रथा विकसित हुई और भारत भूमि तक आ पहुँची। स्वयं सिमोन ने एक नोबल पुरस्कार विजेता दार्शनिक के साथ एक छत के नीचे जीवन के कई वर्ष बिना विवाह के व्यतीत किए थे।
इस पुस्तक में "स्वतंत्र जीवन" शीर्षक की कथा बिना विवाह 'लिव इन रिलेशनशिप' का और "क्या बताऊँ यार" की कहानी समलैंगिक विवाह का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन दोनों की कहानियों में लेखिका स्वयं "मैं" पात्र के रूप में उपस्थित है। ``मैंने बहुत सहजता से पूछा -"शादी क्यों नहीं करना चाहते हो? संतान तो शादी के बाद ही करनी चाहिए?" लड़की ने उत्तर दिया - "वास्तव में शादी करके हम सामाजिक बंधनों मे नहीं बंधना चाहते... हम स्वतंत्र जीवन जी सकेंगे।'' `लड़की का उत्तर सुनकर मैं गंभीर प्रश्नों में उलझ गई।' "मैं" का गंभीर प्रश्नों में उलझ जाना `इस परंपरा की सहज स्वीकृति नहीं हैं। यह विरोध और अस्वीकृति का ही स्वर है।'
आज हमारे देश मे समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता भी प्राप्त हो चुकी है किंतु इसी संग्रह की कहानी "क्या बताऊँ यार" में भोलानाथ शर्मा का कथन "एकदिन मेरा लड़का एक फोटो हाथ मे लेकर बोला, मुझे यह पसंद है, मैं इससे शादी करूँगा।... लपककर मैंने उस फोटो को देखा, वह लड़की नहीं, एक लड़के का फोटो था। मैं अपना माथा पकड़कर बैठ गया"। उनके मित्र योगेंद्र वर्मा जी का हतप्रभ होना, क्या है? यहाँ भी "मैं" का माथा पकड़कर बैठ जाना (मित्र का हतप्रभ होना) इस प्रवृत्ति का विरोध नहीं तो और क्या है?
अब यह विरोध क्यों है, इसे समझना होगा? भारतीय संस्कृति में, सृष्टि विकास परंपरा में विवाह एक पवित्र यज्ञ है, "संतति यज्ञ"। प्रकृति स्वयं ही निरंतर यज्ञरत है। मनुष्य की उत्पत्ति प्रकृति में पांचवी आहुति पड़ने के बाद पूर्ण होती है। समलैंगिक विवाह में संतति तो संभव नहीं। बिना विवाह उत्पन्न हुए संतति में एक बड़ा प्रश्न उठ खड़ा होगा, इनका आपसी रिश्ता क्या है? जैविक रूप से एक ही माता पिता की संतान होते हुए भी क्या वे भी पशुवत एक दूसरे से यूँ ही संबंध बनाएंगे, जहाँ कोई रिश्ता नहीं होता, वे होते हैं केवल एक नर और एक मादा। यह स्थिति मानव का उन्नयन है या पतन? क्या हम मानव को देवत्व की बजाय पशुत्व की और उन्मुख करेंगे? और यदि आपसी संबंध नहीं बनेगा तो नई संतति इस धरा पर नहीं आयेगी और हम जाने अंजाने इस धरा को मानव विहीन ही बनाएंगे । दोनों ही स्थितियों में यह स्वीकार योग्य नहीं है। इसके मूल में मुख्य प्रश्न "यह" है, विरोध का कारण "यहाँ " है, जिसे कहानी में कहीं भी संकेतित नहीं किया गया है, किंतु हमारी चेतना में परंपरा से अदृश्य रूप में विद्यमान है।
अब मेरा प्रश्न है - क्या इस कथा संग्रह की नायिकाएँ पाश्चात्य जगत की इन दो मुख्य प्रवृत्तियों की पोषिका हैं? अरे जो "प्री वेडिंग सूट" में यह निर्णयात्मक टिप्पणी "परिवर्तन यदि अच्छाई के लिए हो तो बहुत अच्छा होता है लेकिन विवेकहीन परिवर्तन हमें कहाँ ले जाएगा बस इसकी कल्पना ही की जा सकती है? स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के सूक्ष्म अंतर को हमें समझना होगा।"
मेरी दृष्टि में `स्वतंत्रता और स्वच्छंतता के सूक्ष्म अंतर को हमें समझना होगा' एक कथन लेखिका का पाश्चात्य विचारधारा के प्रति कोई सहनुभूति नहीं, विरोध का ही प्रमाण है। इसलिए मैंने अपने विवेचन में लिखा है कि लेखिका द्वारा इस कथा संग्रह का शीर्षक "मैं द्रौपदी नहीं हूँ ", अति उत्साह में लिया गया निर्णय नहीं है। उनके अंतः में भारतीय सांस्कृतिक और भारतीय प्रतीकों, बिंबों के प्रति आदर और स्नेह है। इस शीर्षक "मैं द्रौपदी नहीं हूँ " की शब्दावली को सांस्कृतिक बिम्ब 'द्रौपदी' के अपमान" या "मूल्यहीनता, अनुपयोगिता... जैसे भावों से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। वह बिम्ब सबल है, सशक्त और नर तथा नारी दोनों के लिए प्रेरक है। आध्यात्मिक, संस्कृति बिंबों के प्रयोग में साहित्यकारों, रचनाकारों को भी अत्यंत सतर्क रहना चाहिए। एक छोटी सी असतर्कता भी एक बड़े विवाद का कारण बन सकता है।
... तथापि इन गुण दोषों के साथ भी यह कथा संग्रह अत्यंत उपयोगी और नारी जगत को आत्मनिर्भर, सशक्त, स्वविवेकी और स्वत: निर्णय हेतु प्रेरित करने वाला, विकृतियों, कुप्रथाओं से डट कर लोहा लेने वाला, संस्कृति समर्थक प्रेरक और स्वीकार्य "कथा संग्रह" है। यह नवयुग की नई कहानी है जिसमें सर्वांगीण सभ्य समाज सृजन और विकृतियों के सार्थक स्वर गुंजित है। इस कथा संग्रह का हार्दिक स्वागत। यह प्रत्येक घरों में पढ़ा जानी चाहिए। यह संग्रह समाज में पथ प्रदर्शक देदीप्यमान दीपक का कार्य करेगा, ऐसी आशा की जानी चाहिए। डॉ रमा द्विवेदी जी को हार्दिक बधाई और इसी प्रकार नए पुस्तक सृजन का विनम्र आग्रह भी। ईश्वर उनकी लेखनी को यशस्वी बनाएँ ।
*डॉ जयप्रकाश तिवारी*
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
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