Wednesday, July 26, 2023

रेत का समंदर: समीक्षा

मेरे कविता संग्रह `रेत का समंदर ' की अति विशद -अति सूक्ष्म गहनतम समीक्षा श्रद्धेय डॉ जय प्रकाश तिवारी जी ने की है | मैं उन्हें अंतर्मन की गहराइयों से नमन करती हूँ .... ================================================ विचार तबतक पल्लवित–पुष्पित नहीं होते जबतक रचनाकार की अपनी कोई निजी सोच–संवेदना और दार्शनिक चिंतन नहीं होता.दर्शन और चिंतन का आधार वही सोच, सिद्धांत और विमर्श होता है. रचनाकार अपनी कल्पनाशीलता द्वारा इस सिद्धांत को समाजोपयोगी बनाकर सृजन और विकास हेतु जन मानस के समक्ष प्रस्तुत करता है. डॉ. रमा द्विवेदी जी के अन्दर ये सारी विशेषताएं सुदृढ़ और सतर्क रूप में सतत उपस्थित हैं. इस प्रकार “रेत का समन्दर’ में संकलिर रचनाओं के आधार पर यह कहना पड़ेगा कि डॉ. रमा द्विवेदी के अंतर्मन में बहुयामी संवेदनाओं-प्रकाल्पनों की तरंगों का ज्वार-भाटा रह-रह कर उबाल मारता है और सुदूर किनारे तक अपनी छाप छोड़ जाता है. इस चिंतन-वृक्ष की डाली-डाली, शाखा-प्रशाखा, पल्लव-पुष्पों से भी चिंतन ध्वनि निःसृत होती है लेकिन उन सभी में उसी जड़ का चिंतन रस है जो कवयित्री के अन्दर हिलोरें मारता रहता है. शाखा की तरह तरुवर की जड़ें भी जमीं की अंतर गहराई से जीवनद्रव्य अवशोषित करती हैं तो कभी उपनिषद् के ‘ऊर्ध्वमूलं अधोशाखा’ की तरह शून्य गगन से भी प्राण तत्व अवशोषित करती हैं. पृथ्वी सतह से शून्य गगन के बीच ही प्रायः मानव का सारा जीवन व्यापर है. मानव समाज के प्रायः सभी क्रिया-कलापों से कच्चामाल संवेदना के रूप में ग्रहण करके, समीक्षा के परिपक्व आंच पर पकाया है यह एक ऐसा साहित्यिक डिश है जिसमे ‘शहद और लवण’, ‘मधुरता और तीक्ष्णता’ सब साथ-साथ हैं.जीवन ये विविध रंग-रूप और स्वाद ही इस काव्य-ग्रन्थ का सौन्दर्य भी हैं और उपयोगिता भी. इस ग्रन्थ के इसी सौन्दर्य और उपादेयता पर एक दृष्टि डाली जाएगी विभिन्न उप-शीर्षकों के रूप में जिससे सपच के वैशिष्ट्य के साथ-साथ सामाजिक जीवन में इस काव्य ग्रन्थ की उपयोगिता का निर्धारण किया जा सके. शीर्षक विचार: कवयित्री डॉ. रमा द्विवेदी ने इस काव्य ग्रन्थ का नाम रखा है – ‘रेत का समन्दर’. समुद्र में तो जल होता है, रेत उसकी तलहटी में होता है. लेकिन ‘रेत का समन्दर’, इसका क्या अर्थ? हां, अर्थ है इसका- व्यंजनात्मक अर्थ, और हमे उसी रूप में इसे देखना भी चाहिए. यहाँ ‘रेत’शब्द महत्वपूर्ण है जिसके विशेषण के रूप में ‘समन्दर’ शब्द का प्रयोग हुआ है. रेत वे बालुका-राशियाँ हैं जो जहाँ पर है विपुल मात्र में हैं- एक समन्दर की तरह असीम, जहाँ तक दृष्टि जाती है, रेत ही रेत ..., लेकिन एकल रूप में. एक दूसरे से सर्वथा पृथक-पृथक. मृत्तिका की तरह इनमे आपसी स्नेह-लगाव-जुड़ाव-मैत्रीभाव जैसा संवेदनात्मक गुण नहीं होता; यद्यपि साथ-साथ रहना इनकी नियति है, विवशता है, इसलिए साथ में रहते हैं. आज मानव की भी यही दशा है. समाज में रहता है लेकिन आत्मीयता के बंधन, सामाजिक सौहार्द्र-बंधन, पारिवारिक दायित्व-बंधन, ये सम अब उसे स्नेहडोर से बाँध नहीं रहे. वह रेत सा एकल सोच और एकल व्यवहार का बनता चला जा रहा.उसकी अपनी कोई सांकृतिक आकर्षण बंधन भी नहीं. जैसी हवा बहती है, जिस दिशा से बहती है, उसी के अनुरूप वह बहता हुआ -उड़ता हुआ, विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ-प्रवृत्तियों का निर्माण करता रहता है. कभी वे आकर्षक भी लगती हैं कभी विकृत भी. कवयित्री की मूल पीड़ा यही है जो चिन्तनशील ‘रेत’ और मानव समाज को ‘रेत का समन्दर’ कह बैठतीं हैं. यही ध्वन्यार्थ उनकी रचनाओं से भी प्रस्फुटित हैं. वे स्वीकार करती हैं – “जिंदगी कभी उपवन में खिले रंग विरंगे फूलों की तरह होती हैं तो कभी जिंदगी में विद्रूपताओं, विडम्बनाओं, विभीषिकाओं का अंधड़-तूफ़ान आ जाता है जिसमे जीवन के प्रति विश्वास-आस्था-निष्ठां, प्रेम और सपने बहुत कुछ टूट कर, विखर कर रेत का समन्दर बन जाता है”. लेकिन यहाँ जो बात विदुषी कवयत्री ने नहीं कहा, वह है– पुनर्निर्माण की आस्था. समन्दर का जल ही तेर कानों को भिगोकर उनमे आपसी एकता और संगठन की क्षमता विक्सित करता है. भीगी रेत को आंधी-तूफ़ान उदा नहीं सकते, मनमानी सभ्यता-संस्कृति का निर्माण नहीं कर सकते. और कल्पना कीजिये यदि इसी रेत और जल के साथ सद्विचार और स्नेह का सीमेंट मिल जाय, तब? तब यही रेत पत्थर बन सकते हैं... सभ्य की अट्टालिकाए तथा संस्कृति के पवित्र शिवालय का निर्माण कर सकते हैं. संसकृति के इसी शिवालय में सत्यम के पुष्प, शिव को समर्पित होकर, जगत को प्रेम के सौन्दर्य से सुवासित कर सकते हैं; और इस प्रकार धारा पर‘सत्यम’, ‘शिवम’ और ‘सुन्दरम’ के साम्राज्य की स्थापना में संदेह नहीं. कवियत्री के अंतर्मन का यह भाव वंदना के रूप में इस काव्य-संग्रह की प्रथम रचना में ही प्रकट हो जाता है – विनती मेरी इतनी सी माँ, आशीष अपना दे दो माँ! सत्यं शिवं सुन्दरम् रचूँ नमो नमामि, नमामि माँ! कवियत्री के चिंतन का केन्द्रीय विन्दु मानवीय संबंधों में अभीप्सा की कमी, मानवीय मूल्यों में गिरावट है – “मरुस्थल बने सम्बन्ध सब / आत्मीयता – स्नेह की निर्झरिणी / सूख गयी है / स्नेहहीन रिश्ते / छटपटा रहे हैं / तपती रेत पर / एक बूँद स्नेह की खातिर”. इस दृष्टि से काव्य-ग्रन्थ का शीर्षक ‘रेत का समन्दर’ सर्वथा उचित प्रतीत होता है. तत्त्व दर्शन: कवियत्री का तत्वदर्शन पारंपरिक सनातन मूल्यों और स्थापित औपनिषदिक दर्शन पर आद्धरित है जो आवर्त में गति करता हुआ ‘सृष्टि और प्रलय’ तथा ‘प्रलय और सृष्टि’ चक्र के बीच से गुजरता है. कवियत्री ने प्रलय को ‘शून्य’ तथा सृष्टि को ‘अंक’ कहा है. उनकी अपनी अवधारणा है कि – ‘जीवन जब भी जटिल कठिन लगे / शून्य में खो जाओ / शून्य से फिर आरंभ करो / जीवन को नई ऊर्जा / नई स्फूर्ति का अहसास / शून्य को अंकों में बदल देता है’. यहाँ एक अन्तः चेतना जगी, नई स्फूर्ति का एहसास भी हुआ. शून्य! अरे प्रलय ही तो शून्य है और सृष्टि है अंक. चाहे वह एक हो या अनन्त. मूलरूप में संख्या केवल दो ही हैं- एक (१) और शून्य (०). समझने और समझाने की दृष्टि से व्यावहारिक रूप में अनंत (∞) को इसमें भी सम्मिलित किया जा सकता है. इससे सृष्टि की व्याख्या में सरलता होगी. परमतत्व एक (१) है; तत्वरूप में भी और इकाईरूप में भी. इस परमतत्व का प्रकटन और विलोपन होता रहता है. प्रकटरूप में वह अनंत है, गतिज ऊर्जा है और विलोपन (प्रलय) की स्थिति में वही शून्य है. प्रलयावस्था में यह अनंत निष्क्रिय, अर्थहीन हो जाता है और केवल शून्य ही शेष बचता है. इस स्थिति में कोई माप नहीं, कोई मान नहीं, कोई दृश्य नहीं, कोई सृष्टि नहीं, कोई दृष्टि नहीं, कोई द्रष्टा नहीं. परन्तु अस्तित्वाव्मान का अस्तित्व है, मूलऊर्जा विद्यमान है- स्थितिज ऊर्जा के रूप में. इसके अस्तित्व को नाकारा नहीं जा सकता. अरे ये सारे अंक तो ‘शून्य’ और ‘अनन्त’ के बीच का विवर्त है. शून्य के साथ अंक जुड जाने से वह भौतिक रूप से मूल्यवान–रूपवान हो जाता है. सगुण हो जाता है. यह सगुण तो निर्गुण में ही प्रतिष्ठित है. मृत्यु इसी लिए बड़ी है, किसी भी जीवन से. जीवन मृत्यु में ही विश्राम पाता है और यह प्रकृति और सृष्टि प्रलय में, शून्य में. यही पुरुष और प्रकृति का खेल है. समाज दर्शन: किसी भी तत्वदर्शन का महत्व उसकी सामाजिक उपादेयता, उसमे अन्तर्निहित सामाजिक सरोकारों की अभिव्यक्ति से है. सामाजिक मनोभाओं, संवेदनाओं, परम्परों और रीति-रिवाजों के मूल्यांकन से है. इस दृष्टि से डॉ. रमा द्विवेदी की संवेदना गहरे पैठ की रही है. बदलते समय में मानवीय संवेदनाओं का कठोर बन जाना उनकी दृष्टि में मानवता के लिए घातक है तभी तो वे बोल उठती हैं –“रेखाओं की संवेदना को / कठोर न बनने दें / नहीं तो मनुष्यता नष्ट हो जाएगी”. लेकिन सामाजिक मूल्यों का, परम्पराओं और व्यवस्थाओं का पालन होना चाहिए. बेशक ये रेखाए लक्ष्मण-रेखा जैसी न हों, लेकिन रेखा, मूल्यपरक रेखा तो होनी ही चाहिए. वही हमारी सभ्यता है, संस्कृति की पहचान है. कवियत्री व्यथित है- “आधुनिक घरों में / नहीं रही दहलीज की परंपरा / इसलिए न कोई मर्यादा है / न जीवन आचरण के मूल्य”. और नई पीढ़ी दिग्भ्रमित हो भटक रही है / मूल्यहीनता की दिशा में”. मूल्यों के टूटने पर पहचान ध्वस्त होती है- जाति की, देश की, मानवता की. आखिर मूल्य स्थापित होने में सहस्रों मनीषियों की उच्चतर मेधा और अरबों वर्ष का समय श्रम और तप लगा है. गहन अनुसन्धान और शोध का परिणाम हैं ये मूल्य. इसलिए ये मूल्य अनिवार्य अंग हैं मानवीय संवेदना के. उस प्रगति का क्या अर्थ जिसमे ये मूल्य ही ध्वस्त हो जाय? मानवता पर ग्रहण लग जाय. क्या यह अधोपतन अभी कम है जहाँ पर- “अंग भी बिक जाते हैं / माया के दरबार में / चीखों का कितना मूल्य है / साँसों के व्यापार में?”. कवियत्री के अभिव्यक्ति की एक और विशेषता यह भी है कि वह एक ही साथ सामाजिकता की और समाज के परे अत्तिन्द्रिय जगत की भी एक झांकी दिख जाती हैं. यदि प्रेम-प्यार और सौहार्द्र-श्रद्धा जैसे भावनात्मक शब्दों को ही लिया जाय तो यह जितना आपसी रिश्ते लिए है, उतना ही राष्ट्र के लिए है और उसके लिए भी जिसे हम अपना इष्ट मानते हैं – “आधुनिक प्यार के मायने बदल गए हैं / प्यार अब निष्ठा विश्वास / का नाम नहीं / प्यार अब दिल बहलाने का / झुनझुना बनकर रह गया है”. इस विन्दु पर वे केवल आलोचना ही नहीं करती, प्यार को परिभाषित भी करती हैं – “प्यार एक संवेदना है / एक जज्बा, एक एहसास है / जिसे संसार भर के / शब्दकोश भी परिभाषित नहीं का सकते”. आपसी संबंधों की प्रगाढ़ता, संवेदनाएं, एहसास कितने खोखले गए हैं, कितनी औपचारिकता मात्र बनकर रह गयी है, वह भी दिखावे के लिए. यह दर्द उनकी क्षणिकाओं में उभरकर आती हैं. अंतिम-साथ के रूप में इंसान अपने शत्रु की भी शवयात्रा में सम्मिलित हो जाता है, पारिवारिक और मित्रों के लिए तो अनिवार्यत रूप में आवश्यक है. लेकिन यह अनिवार्यता वाला एहसास भी टूट रहा है. हमारे पास रटारटाया एक बहाना है समयाभाव का या आधुनिकता की यह दलील, कौन बैठे चिता के पास दो से तीन घंटे तक? “इसलिए शव को / श्मशान घाट पर नहीं / क्रेमीटोरियम में जलाना चाहते हैं”. इस संकलन में मात्र आलोचनाएँ ही नहीं हैं, सृजनात्मक परिवर्तन के लिए प्यार और उल्लासभरा स्वागत भी है जो उनके नव वर्ष गीतों में उभरकर आया है. कुलमिलाकर ‘रेत का समन्दर’ एक पठनीय और मननीय काव्य-ग्रन्थ है. इब ग्रन्थ में उर्दू-फ़ारसी के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा के शब्दों को भी अभिव्यक्ति में सहायक बनाया गया है. हिंदी भाषा से इतर शब्दों का प्रयोग पाठक की बढ़ोत्तरी की दृष्टि से, बोध की दृष्टि से, भाव की दृष्टि से तो ठीक है, परन्तु यह वहीं तक स्वीकार्य है जहाँतक साहित्य प्रभावित नहीं होता. कहीं-कहीं ये शब्द साहित्य की दृष्टि से हिदी-काव्य के साथ न्याय करते हुए नहीं लगते. हिन्द-युग्म प्रकाशन, नई दिल्ली-१६ द्वरा आकर्षक रंगरूप में प्रकाशित यह कविता-संग्रह एक माननीय और पठनीय काव्य कृति है और समाज के प्रत्येक आयुवर्ग के लिए इसमें रोचक और सृजनात्मक बातें हैं, इसमें कहीं कोई दुविधा और संसय नहीं है. डॉ. जयप्रकाश तिवारी तिवारी सदन भरसर, बलिया (उ.प्र.) मो. ९४५०८०२२४०मेरे कविता संग्रह `रेत का समंदर ' की अति विशद -अति सूक्ष्म गहनतम समीक्षा श्रद्धेय डॉ जय प्रकाश तिवारी जी ने की है | मैं उन्हें अंतर्मन की गहराइयों से नमन करती हूँ .... ================================================ विचार तबतक पल्लवित–पुष्पित नहीं होते जबतक रचनाकार की अपनी कोई निजी सोच–संवेदना और दार्शनिक चिंतन नहीं होता.दर्शन और चिंतन का आधार वही सोच, सिद्धांत और विमर्श होता है. रचनाकार अपनी कल्पनाशीलता द्वारा इस सिद्धांत को समाजोपयोगी बनाकर सृजन और विकास हेतु जन मानस के समक्ष प्रस्तुत करता है. डॉ. रमा द्विवेदी जी के अन्दर ये सारी विशेषताएं सुदृढ़ और सतर्क रूप में सतत उपस्थित हैं. इस प्रकार “रेत का समन्दर’ में संकलिर रचनाओं के आधार पर यह कहना पड़ेगा कि डॉ. रमा द्विवेदी के अंतर्मन में बहुयामी संवेदनाओं-प्रकाल्पनों की तरंगों का ज्वार-भाटा रह-रह कर उबाल मारता है और सुदूर किनारे तक अपनी छाप छोड़ जाता है. इस चिंतन-वृक्ष की डाली-डाली, शाखा-प्रशाखा, पल्लव-पुष्पों से भी चिंतन ध्वनि निःसृत होती है लेकिन उन सभी में उसी जड़ का चिंतन रस है जो कवयित्री के अन्दर हिलोरें मारता रहता है. शाखा की तरह तरुवर की जड़ें भी जमीं की अंतर गहराई से जीवनद्रव्य अवशोषित करती हैं तो कभी उपनिषद् के ‘ऊर्ध्वमूलं अधोशाखा’ की तरह शून्य गगन से भी प्राण तत्व अवशोषित करती हैं. पृथ्वी सतह से शून्य गगन के बीच ही प्रायः मानव का सारा जीवन व्यापर है. मानव समाज के प्रायः सभी क्रिया-कलापों से कच्चामाल संवेदना के रूप में ग्रहण करके, समीक्षा के परिपक्व आंच पर पकाया है यह एक ऐसा साहित्यिक डिश है जिसमे ‘शहद और लवण’, ‘मधुरता और तीक्ष्णता’ सब साथ-साथ हैं.जीवन ये विविध रंग-रूप और स्वाद ही इस काव्य-ग्रन्थ का सौन्दर्य भी हैं और उपयोगिता भी. इस ग्रन्थ के इसी सौन्दर्य और उपादेयता पर एक दृष्टि डाली जाएगी विभिन्न उप-शीर्षकों के रूप में जिससे सपच के वैशिष्ट्य के साथ-साथ सामाजिक जीवन में इस काव्य ग्रन्थ की उपयोगिता का निर्धारण किया जा सके. शीर्षक विचार: कवयित्री डॉ. रमा द्विवेदी ने इस काव्य ग्रन्थ का नाम रखा है – ‘रेत का समन्दर’. समुद्र में तो जल होता है, रेत उसकी तलहटी में होता है. लेकिन ‘रेत का समन्दर’, इसका क्या अर्थ? हां, अर्थ है इसका- व्यंजनात्मक अर्थ, और हमे उसी रूप में इसे देखना भी चाहिए. यहाँ ‘रेत’शब्द महत्वपूर्ण है जिसके विशेषण के रूप में ‘समन्दर’ शब्द का प्रयोग हुआ है. रेत वे बालुका-राशियाँ हैं जो जहाँ पर है विपुल मात्र में हैं- एक समन्दर की तरह असीम, जहाँ तक दृष्टि जाती है, रेत ही रेत ..., लेकिन एकल रूप में. एक दूसरे से सर्वथा पृथक-पृथक. मृत्तिका की तरह इनमे आपसी स्नेह-लगाव-जुड़ाव-मैत्रीभाव जैसा संवेदनात्मक गुण नहीं होता; यद्यपि साथ-साथ रहना इनकी नियति है, विवशता है, इसलिए साथ में रहते हैं. आज मानव की भी यही दशा है. समाज में रहता है लेकिन आत्मीयता के बंधन, सामाजिक सौहार्द्र-बंधन, पारिवारिक दायित्व-बंधन, ये सम अब उसे स्नेहडोर से बाँध नहीं रहे. वह रेत सा एकल सोच और एकल व्यवहार का बनता चला जा रहा.उसकी अपनी कोई सांकृतिक आकर्षण बंधन भी नहीं. जैसी हवा बहती है, जिस दिशा से बहती है, उसी के अनुरूप वह बहता हुआ -उड़ता हुआ, विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ-प्रवृत्तियों का निर्माण करता रहता है. कभी वे आकर्षक भी लगती हैं कभी विकृत भी. कवयित्री की मूल पीड़ा यही है जो चिन्तनशील ‘रेत’ और मानव समाज को ‘रेत का समन्दर’ कह बैठतीं हैं. यही ध्वन्यार्थ उनकी रचनाओं से भी प्रस्फुटित हैं. वे स्वीकार करती हैं – “जिंदगी कभी उपवन में खिले रंग विरंगे फूलों की तरह होती हैं तो कभी जिंदगी में विद्रूपताओं, विडम्बनाओं, विभीषिकाओं का अंधड़-तूफ़ान आ जाता है जिसमे जीवन के प्रति विश्वास-आस्था-निष्ठां, प्रेम और सपने बहुत कुछ टूट कर, विखर कर रेत का समन्दर बन जाता है”. लेकिन यहाँ जो बात विदुषी कवयत्री ने नहीं कहा, वह है– पुनर्निर्माण की आस्था. समन्दर का जल ही तेर कानों को भिगोकर उनमे आपसी एकता और संगठन की क्षमता विक्सित करता है. भीगी रेत को आंधी-तूफ़ान उदा नहीं सकते, मनमानी सभ्यता-संस्कृति का निर्माण नहीं कर सकते. और कल्पना कीजिये यदि इसी रेत और जल के साथ सद्विचार और स्नेह का सीमेंट मिल जाय, तब? तब यही रेत पत्थर बन सकते हैं... सभ्य की अट्टालिकाए तथा संस्कृति के पवित्र शिवालय का निर्माण कर सकते हैं. संसकृति के इसी शिवालय में सत्यम के पुष्प, शिव को समर्पित होकर, जगत को प्रेम के सौन्दर्य से सुवासित कर सकते हैं; और इस प्रकार धारा पर‘सत्यम’, ‘शिवम’ और ‘सुन्दरम’ के साम्राज्य की स्थापना में संदेह नहीं. कवियत्री के अंतर्मन का यह भाव वंदना के रूप में इस काव्य-संग्रह की प्रथम रचना में ही प्रकट हो जाता है – विनती मेरी इतनी सी माँ, आशीष अपना दे दो माँ! सत्यं शिवं सुन्दरम् रचूँ नमो नमामि, नमामि माँ! कवियत्री के चिंतन का केन्द्रीय विन्दु मानवीय संबंधों में अभीप्सा की कमी, मानवीय मूल्यों में गिरावट है – “मरुस्थल बने सम्बन्ध सब / आत्मीयता – स्नेह की निर्झरिणी / सूख गयी है / स्नेहहीन रिश्ते / छटपटा रहे हैं / तपती रेत पर / एक बूँद स्नेह की खातिर”. इस दृष्टि से काव्य-ग्रन्थ का शीर्षक ‘रेत का समन्दर’ सर्वथा उचित प्रतीत होता है. तत्त्व दर्शन: कवियत्री का तत्वदर्शन पारंपरिक सनातन मूल्यों और स्थापित औपनिषदिक दर्शन पर आद्धरित है जो आवर्त में गति करता हुआ ‘सृष्टि और प्रलय’ तथा ‘प्रलय और सृष्टि’ चक्र के बीच से गुजरता है. कवियत्री ने प्रलय को ‘शून्य’ तथा सृष्टि को ‘अंक’ कहा है. उनकी अपनी अवधारणा है कि – ‘जीवन जब भी जटिल कठिन लगे / शून्य में खो जाओ / शून्य से फिर आरंभ करो / जीवन को नई ऊर्जा / नई स्फूर्ति का अहसास / शून्य को अंकों में बदल देता है’. यहाँ एक अन्तः चेतना जगी, नई स्फूर्ति का एहसास भी हुआ. शून्य! अरे प्रलय ही तो शून्य है और सृष्टि है अंक. चाहे वह एक हो या अनन्त. मूलरूप में संख्या केवल दो ही हैं- एक (१) और शून्य (०). समझने और समझाने की दृष्टि से व्यावहारिक रूप में अनंत (∞) को इसमें भी सम्मिलित किया जा सकता है. इससे सृष्टि की व्याख्या में सरलता होगी. परमतत्व एक (१) है; तत्वरूप में भी और इकाईरूप में भी. इस परमतत्व का प्रकटन और विलोपन होता रहता है. प्रकटरूप में वह अनंत है, गतिज ऊर्जा है और विलोपन (प्रलय) की स्थिति में वही शून्य है. प्रलयावस्था में यह अनंत निष्क्रिय, अर्थहीन हो जाता है और केवल शून्य ही शेष बचता है. इस स्थिति में कोई माप नहीं, कोई मान नहीं, कोई दृश्य नहीं, कोई सृष्टि नहीं, कोई दृष्टि नहीं, कोई द्रष्टा नहीं. परन्तु अस्तित्वाव्मान का अस्तित्व है, मूलऊर्जा विद्यमान है- स्थितिज ऊर्जा के रूप में. इसके अस्तित्व को नाकारा नहीं जा सकता. अरे ये सारे अंक तो ‘शून्य’ और ‘अनन्त’ के बीच का विवर्त है. शून्य के साथ अंक जुड जाने से वह भौतिक रूप से मूल्यवान–रूपवान हो जाता है. सगुण हो जाता है. यह सगुण तो निर्गुण में ही प्रतिष्ठित है. मृत्यु इसी लिए बड़ी है, किसी भी जीवन से. जीवन मृत्यु में ही विश्राम पाता है और यह प्रकृति और सृष्टि प्रलय में, शून्य में. यही पुरुष और प्रकृति का खेल है. समाज दर्शन: किसी भी तत्वदर्शन का महत्व उसकी सामाजिक उपादेयता, उसमे अन्तर्निहित सामाजिक सरोकारों की अभिव्यक्ति से है. सामाजिक मनोभाओं, संवेदनाओं, परम्परों और रीति-रिवाजों के मूल्यांकन से है. इस दृष्टि से डॉ. रमा द्विवेदी की संवेदना गहरे पैठ की रही है. बदलते समय में मानवीय संवेदनाओं का कठोर बन जाना उनकी दृष्टि में मानवता के लिए घातक है तभी तो वे बोल उठती हैं –“रेखाओं की संवेदना को / कठोर न बनने दें / नहीं तो मनुष्यता नष्ट हो जाएगी”. लेकिन सामाजिक मूल्यों का, परम्पराओं और व्यवस्थाओं का पालन होना चाहिए. बेशक ये रेखाए लक्ष्मण-रेखा जैसी न हों, लेकिन रेखा, मूल्यपरक रेखा तो होनी ही चाहिए. वही हमारी सभ्यता है, संस्कृति की पहचान है. कवियत्री व्यथित है- “आधुनिक घरों में / नहीं रही दहलीज की परंपरा / इसलिए न कोई मर्यादा है / न जीवन आचरण के मूल्य”. और नई पीढ़ी दिग्भ्रमित हो भटक रही है / मूल्यहीनता की दिशा में”. मूल्यों के टूटने पर पहचान ध्वस्त होती है- जाति की, देश की, मानवता की. आखिर मूल्य स्थापित होने में सहस्रों मनीषियों की उच्चतर मेधा और अरबों वर्ष का समय श्रम और तप लगा है. गहन अनुसन्धान और शोध का परिणाम हैं ये मूल्य. इसलिए ये मूल्य अनिवार्य अंग हैं मानवीय संवेदना के. उस प्रगति का क्या अर्थ जिसमे ये मूल्य ही ध्वस्त हो जाय? मानवता पर ग्रहण लग जाय. क्या यह अधोपतन अभी कम है जहाँ पर- “अंग भी बिक जाते हैं / माया के दरबार में / चीखों का कितना मूल्य है / साँसों के व्यापार में?”. कवियत्री के अभिव्यक्ति की एक और विशेषता यह भी है कि वह एक ही साथ सामाजिकता की और समाज के परे अत्तिन्द्रिय जगत की भी एक झांकी दिख जाती हैं. यदि प्रेम-प्यार और सौहार्द्र-श्रद्धा जैसे भावनात्मक शब्दों को ही लिया जाय तो यह जितना आपसी रिश्ते लिए है, उतना ही राष्ट्र के लिए है और उसके लिए भी जिसे हम अपना इष्ट मानते हैं – “आधुनिक प्यार के मायने बदल गए हैं / प्यार अब निष्ठा विश्वास / का नाम नहीं / प्यार अब दिल बहलाने का / झुनझुना बनकर रह गया है”. इस विन्दु पर वे केवल आलोचना ही नहीं करती, प्यार को परिभाषित भी करती हैं – “प्यार एक संवेदना है / एक जज्बा, एक एहसास है / जिसे संसार भर के / शब्दकोश भी परिभाषित नहीं का सकते”. आपसी संबंधों की प्रगाढ़ता, संवेदनाएं, एहसास कितने खोखले गए हैं, कितनी औपचारिकता मात्र बनकर रह गयी है, वह भी दिखावे के लिए. यह दर्द उनकी क्षणिकाओं में उभरकर आती हैं. अंतिम-साथ के रूप में इंसान अपने शत्रु की भी शवयात्रा में सम्मिलित हो जाता है, पारिवारिक और मित्रों के लिए तो अनिवार्यत रूप में आवश्यक है. लेकिन यह अनिवार्यता वाला एहसास भी टूट रहा है. हमारे पास रटारटाया एक बहाना है समयाभाव का या आधुनिकता की यह दलील, कौन बैठे चिता के पास दो से तीन घंटे तक? “इसलिए शव को / श्मशान घाट पर नहीं / क्रेमीटोरियम में जलाना चाहते हैं”. इस संकलन में मात्र आलोचनाएँ ही नहीं हैं, सृजनात्मक परिवर्तन के लिए प्यार और उल्लासभरा स्वागत भी है जो उनके नव वर्ष गीतों में उभरकर आया है. कुलमिलाकर ‘रेत का समन्दर’ एक पठनीय और मननीय काव्य-ग्रन्थ है. इब ग्रन्थ में उर्दू-फ़ारसी के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा के शब्दों को भी अभिव्यक्ति में सहायक बनाया गया है. हिंदी भाषा से इतर शब्दों का प्रयोग पाठक की बढ़ोत्तरी की दृष्टि से, बोध की दृष्टि से, भाव की दृष्टि से तो ठीक है, परन्तु यह वहीं तक स्वीकार्य है जहाँतक साहित्य प्रभावित नहीं होता. कहीं-कहीं ये शब्द साहित्य की दृष्टि से हिदी-काव्य के साथ न्याय करते हुए नहीं लगते. हिन्द-युग्म प्रकाशन, नई दिल्ली-१६ द्वरा आकर्षक रंगरूप में प्रकाशित यह कविता-संग्रह एक माननीय और पठनीय काव्य कृति है और समाज के प्रत्येक आयुवर्ग के लिए इसमें रोचक और सृजनात्मक बातें हैं, इसमें कहीं कोई दुविधा और संसय नहीं है. डॉ. जयप्रकाश तिवारी तिवारी सदन भरसर, बलिया (उ.प्र.) मो. ९४५०८०२२४०

Wednesday, July 19, 2023

मैं द्रौपदी नहीं हूं : युग बोध का प्रतिबिंबन

संप्रेषण,मानवीय चेतना का अनिवार्य सत्य है जिसे साहित्य के संदर्भ में हम  स्थूल से सूक्ष्म के निरुपण -यात्रा के तहत एक शाश्वत सत्य के रूप में देखते हैं। सत्य है, साहित्य के संदर्भ में यही मानवीय चेतना लघुतम संप्रेषण से संवहित हो अभिव्यक्ति के‌ माध्यम में रुपायित हो लघुकथा का रूप ले‌ लेती है। साहित्य की एक ऐसी स्वतंत्र  सशक्त , संप्रेषित विधा, जो रचना उद्यमिता के अंतर्गत,संवेदना को केंद्र में रखकर, अपने लघु रूप में होने के बावजूद, समकालीन समाज के संपूर्ण यथार्थ में व्याप्त,जीवन मूल्यों को उद्घाटित करने का माद्दा रखती है। कथाकार,रमा द्विवेदी जी की पुस्तक , "मैं द्रौपदी नहीं हूं" इन्ही जीवन मूल्यों के उद्घाटन की अगली कड़ी है। शब्दांकुर प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित,133‌ पृष्ठों के इस  पुस्तक में ,कुल मिलाकर 102 लघुकथाओं का संकलन है । 


मैं  द्रौपदी नहीं हूं, शीर्षक नाम से मुद्रित इस पुस्तक में,द्रौपदी के पौराणिक मिथक में सामाजिक चेतना भरती कहानी की नायिका मिथकीय युग का आह्वान कर , इतिहास के पन्ने को फिर से पलटने के लिए नहीं बल्कि उसमें स्त्री सत्ता के सशक्त निर्णयात्मक भाव का प्रतिनिधित्व कर आधुनिक संदर्भ में उसी इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने को तैयार है। शीर्षक में परिलक्षित यह स्त्री  पुरुष सत्तात्मक समाज के छल‌ बल  को स्वीकार कर  उसके दैहिक साम्राज्य पर पुरूष की गंदी घिनौनी सत्ता को स्वीकार करने को बिल्कुल तैयार‌ नहीं। वह अपनी अस्मिता के लिए पुरुष -तंत्रों की ओर प्रश्नों की लड़ी लिए सिसकती चित्कारती स्त्री नहीं बल्कि, संपूर्ण सशक्तता से समाधान के साथ तैयार‌ खड़ी स्त्री है जो संघर्षों का सामना करने के  लिए तैयार है ,अकेली तैयार है ,पूरी तरह तैयार है । 

अपने मूल‌ में, समसामयिक समाज के यथार्थ -पयोधियों और सरिताओं के कड़वे मीठे, बूंदों को जीवन मूल्यों की गगरी में भरता यह रमा द्विवेदी जी का यह लघुकथा संकलन, समाज के सभी वर्गों में व्याप्त क्षरण को ,फिर चाहें वे पारिवारिक हों या राजनीतिक, सामाजिक हों या धार्मिक या फिर सांस्कृतिक  सभी चेतनाओं के बिखरे -टूटे,खंडित होते प्रतिबिंबों को एक साथ जोड़ने की सफल कोशिश की है। समाज के व्यक्तियों की दायित्वहीनता को केंद्र में रखकर , मानवीय मूल्यों में आई गिरावट,उनके सैद्धांतिक और वैचारिक दृष्टिकोणों में आए अंधेपन की शिथिलता को यूं एक जगह समेटकर ,इतनी सरलता से पाठकों के मध्य‌ रखे इस संकलन की सभी कहानियों में युग चेतना का बोध है। फिर चाहे वह पौराणिक मिथक को सामाजिक चेतना से जोड़ती कहानी , मैं द्रौपदी नहीं हूं हो या फिर साहित्य में व्याप्त बाजारीकरण को उजागर करने के उद्देश्य से लिखी लघुकथा , ठगुआ कवि ,लोभी गुरू लालची चेला ,कविता चोर,सरतार बनिया, नून चबेना  ,संपादक,मूल लेखक कैसे ,रिमार्क हो। सभी युग बोध की अभिव्यक्ति से अभिषिक्त हैं। हालांकि यहां सभी लघुकथाओं को विश्लेषित कर पाना मुश्किल होगा, फिर भी मैं कुछ लघुकथाओं की चर्चा अवश्य करना चाहूंगी।स्त्री विमर्श के केंद्र में लिखी लघुकथा खरीदी हुई औरत ,कागज का पुर्जा,नियति का खेल,अहंकार ,व्रत की विवशता, गिरावट, चिंतन और‌ चुनौती, राज खुल गया यह सभी पित्रसत्तात्मक व्यवस्था के संस्कारों को उद्धृत करते प्रतीत होते हैं। समय की नब्ज को समझतीं,महसूस करतीं और उसे गहराई से थाम कर रखीं इस संकलन की लेखिका, रमा द्विवेदी की अन्य कथाएं यथा ; क्या बताऊं यार, दहशत , धोखे कैसे कैसे जहां एक ओर समसामयिक विवाह संस्था के लिए चुनौती बनी समलैंगिक संस्कृति को पाठकों के समक्ष रखा है तो वहीं समाज के मूल‌ तबके की विकृत मानसिकता को भी बहुत सशक्तता से पटल पर रखा है। विध्वंसकारी पोर्न   समलैंगिक संस्कृति से टूटते रिश्तों के माध्यम से उन्होंने पाठकों को यथार्थोन्मूख बनाने की कोशिश की है। समसामयिक कहानियों की बात करें तो कोरोना संक्रमण को लक्षित कर लिखी लघुकथाएं यथा; श्रृंगार की जरूरत क्या है,कोरोना से प्रश्न काफी महत्वपूर्ण संवाद करते नजर आते हैं। एक्सचेंज मैरिज ,दूल्हे की बोली,नोट-शराब और खाना ,हंसना मना है , मदिरालय खुल गए अपनी अपनी विवशता , ललचाई नजरें और टैगियासुर जैसी सभी लघुकथाओं में आज के समाजिक चेतना की प्रकृति में ह्रास होते संदर्भ दिखाई देते हैं बल्कि क्षणभंगुर उपलब्धयों के लिए बेसब्र होते मानव की मनोवैज्ञानिक विकृतियों का दस्तावेज भी प्रस्तुत होता दिखता है।

कुल मिलाकर देखें तो लेखिका रमा द्विवेदी अपनी इस संकलन की समस्त लघुकथाओं की बुनावट में, न सिर्फ रचना उद्यमिता के उद्देश्यों को लेकर सजग और सतर्क दिखाई देतीं हैं बल्कि वे कथा के अनुसार शिल्पों और‌ भाषाई प्रबंधन में भी एक जिम्मेवार लेखक की भूमिका का निर्वाह करती प्रतीत होतीं हैं ।यही कारण है कि पाठक सरलता से उनकी रचनात्मक तरंगों के साथ प्रवाहित होते चले जातें हैं।विविध विषयों के विभिन्न लघुकथाओं के संप्रेषण और संकलन में ,मानव मूल्यों की पुनर्स्थापना के क्रम में ,लेखिका ,रमा द्विवेदी जी लघुकथा लेखन की चुनौतियों का न सिर्फ बड़ी सावधानी से सामना करती हुईं दिखती हैं बल्कि इनके माध्यम से  सामाजिक चेतना मे विलुप्त होते जीवन मूल्यों को पुनः स्थापित करने हेतु भी प्रयासरत दिखती हैं  । निश्चित रूप से," मैं द्रौपदी नहीं "  मानव मूल्यों को पुनर्स्थापित करने की एक सफल कोशिश है।

उनकी सफल और सशक्त रचनाधर्मिता के लिए हार्दिक शुभकामनाएं

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डॉ.राशि सिन्हा

नवादा, बिहार

Friday, July 14, 2023

दो मुक्तक

 1-

नई आलोचनाओं का, नया यह दौर आया है

सच चुपचाप बैठा है ,झूठ बस लहलहाया है।

बहुत मुश्किल समझ पाना नई ये ज्ञान की बातें

किसी ने सच छुपाया है, किसी ने सच बताया है।।

2-

पुरानी नींव पर देखो , नया साँचा बनाया है

करें तारीफ सब उसकी, मुलम्में से सजाया है।

बहुत मुश्किल समझ पाना ये शब्दों की कलाकारी

है आकर्षण बहुत इसमें, सभी का मन लुभाया है ।। 

- डॉ रमा द्विवेदी 

Tuesday, July 11, 2023

हर दिल अज़ीज़ शायर साहिर लुधियानवी : संगोष्ठी संपन्न

युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच (पंजीकृत न्यास) आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना राज्य शाखा की बारहवीं ऑनलाइन संगोष्ठी 8 जुलाई 2023 ( शनिवार ) संध्या 3.30 बजे से आयोजित की गई । डॉ. रमा द्विवेदी (अध्यक्ष, आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना राज्य शाखा ) एवं महासचिव दीपा कृष्णदीप ने संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं प्रखर चिंतक प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की । बतौर विशेष अतिथि मूर्धन्य व्यंग्यकार/कथाकार श्री रामकिशोर उपाध्याय (राष्ट्रीय अध्यक्ष,दिल्ली) एवं मुख्य वक्ता बहुचर्चित गज़लकार समीक्षक श्री प्रवीण प्रणव जी मंचासीन हुए।कार्यक्रम का शुभारंभ सुश्री दीपा कृष्णदीप के द्वारा सरस्वती वंदना के साथ हुआ। तत्पश्चात प्रदेश अध्यक्ष डॉ रमा द्विवेदी ने अतिथियों का स्वागत शब्द पुष्पों से किया एवं संस्था का परिचय देते हुए कहा- युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच एक वैश्विक संस्था है और संस्था हिंदी के प्रचार प्रसार के साथ-साथ सभी भारतीय भाषाओं का संवर्धन करती है। वरिष्ठ साहित्यकारों एवं युवा साहित्यकारों का उनके साहित्यिक योगदान हेतु पुरस्कृत / सम्मानित करती है। सभी क्षेत्र की ललित कलाओं को प्रोत्साहित करना भी इस संस्था का उद्देश्य है। प्रथम सत्र "अनमोल एहसास" और "मन के रंग मित्रों के संग" दो शीर्षक के अंतर्गत संपन्न हुआ । प्रथम सत्र के प्रथम भाग अनमोल अहसास के अंतर्गत " हर एक पल का शायर साहिर लुधियानवी " पर परिचर्चा आयोजित की गई। मुख्य वक्ता ख्याति प्राप्त ग़ज़लकार एवं समीक्षक प्रवीण प्रणव जी ने साहिर लुधियानवी के व्यक्तित्व और कृतित्व को बहुत ही रोचक तरीके से प्रस्तुत किया। साहिर की अपनी जिंदगी बचपन से ही मुश्किलों भरी रही, जिनकी वजह से उनकी शायरी में इंकलाबी खुशबू आती है। अपने पिता के प्रति कटुता और माँ के प्रति प्यार की वजह से उनकी शायरी में अंग्रेजों/जमींदारों के खिलाफ़ बगावत और स्त्री विशेषकर माँ के प्रति असीम प्रेम दिखता है। अपने तीस वर्षों के फ़िल्मी सफर में साहिर ने एक से बढ़ कर एक गीत लिखे लेकिन कभी अपने गीतों की गुणवत्ता से समझौता नहीं किया। साहिर अपने असफल प्रेम के लिए भी जाने जाते हैं। कई प्रेम प्रसंग होते हुए भी कोई परवान न चढ़ सका और साहिर ताउम्र कुँवारे रहे। साहिर ने कहा भी ‘जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला, हमने तो बस कलियाँ मांगी, काँटों का हार मिला'। `तल्खियाँ' साहिर का प्रसिद्ध कविता संग्रह है और परछाईयाँ प्रसिद्ध लम्बी नज़्म| साहिर ने अपने 31 वर्षों के फ़िल्मी दौर में 122 फ़िल्मों के लिए कुल 733 गाने लिखे। साहिर को 1971 में पदमश्री के ख़िताब से नवाज़ा गया। 59 वर्ष की अवस्था में 25 अक्टूबर 1980 को दिल का दौरा पड़ने से साहिर लुधियानवी का निधन हो गया। प्रवीण प्रणव ने साहिर की जिंदगी को उनकी; कविताओं और गीतों के माध्यम से एक चलचित्र की तरह प्रस्तुत किया। विशेष अतिथि - आदरणीय प्रख्यात व्यंग्यकार/कथाकार श्री रामकिशोर उपाध्याय जी (राष्ट्रीय अध्यक्ष,दिल्ली) ने अपने वक्तव्य में कहा - अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस अर्थात् आठ मार्च उन्नीस सौ इक्कीस को जन्मे अब्दुल हयी उर्फ़ साहिर लुधियानवी ने प्रेम में असफल होने के बावजूद प्रेम को उन्होंने अपनी कविता ,शायरी या गीतों में प्रमुखता से मुखरित कर हिंदुस्तानी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान बनाया । उनका कृतित्व विशाल है और उनके साहित्य में कोई विषय कभी अछूता नहीं रहा । उनकी कविता में दर्द की सरिता निर्बाध रूप से बहती हुई दिखाई पड़ती है । यह उनकी महानता है कि नास्तिक होते हुए भी उन्होंने भक्ति- दर्शन के अमर गीत रचे । प्रगतिशील विचारों के प्रति सदैव प्रतिबद्ध रहे और फ़िल्मों में देश भक्ति , सामाजिक विषमता ,स्त्रियों,युवाओं और मज़दूरों के प्रति फ़िल्मों में अनेक गीत लिखकर उनके अवदान को भी बखूबी रेखांकित किया । उन्होंने जीवन को बड़ी निकटता से देखा ,भूख और ग़रीबी से रूबरू हुए । वे एक सच्चे मानवतावादी थे । उनके समग्र साहित्य को देखकर यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि वे ``हर पल के शायर है और सदैव अपने गीतों और नज़्मों के माध्यम से सदैव अमर रहेंगे।''तत्पश्चात मन के रंग मित्रो के संग में बहुचर्चित साहित्यकार डॉ. सुषमा देवी जी ने अपने शोध कार्य के समय का प्रेरक प्रसंग सुनाया। जिसका संदेश यह था कि जीवन में चाहे कितनी ही कठिन परिस्थित हो कभी भी हार नहीं माननी चाहिए| अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रखर चिंतक एवं समीक्षक प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने अध्यक्षीय भाषण में विस्तार से ``साहिर लुधियानवी के काव्य में निहित शाश्वतता के तत्वों की चर्चा की और कहा कि किसी भी कवि को 'हर एक पल का शायर' बनने के लिए अपनी वैयक्तिकता का अतिक्रमण करना होता है। प्रो. ऋषभ ने आगे कहा कि साहिर लुधियानवी बीसवीं सदी के सबसे लोकप्रिय उर्दू कवियों में से एक थे, उनकी कविता दर्द, पीड़ा और अन्याय के विषयों की मर्मस्पर्शी और विचारोत्तेजक व्यंजना के लिए जानी जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि साहिर का अपना जीवन व्यक्तिगत त्रासदी और राजनैतिक उथल-पुथल से भरा हुआ था और इन अनुभवों ने उनकी कविता को गहराई से प्रभावित किया।''उन्होंने अध्यक्षीय काव्य पाठ किया एवं सफल कार्यक्रम की शुभकामनाएं दीं | प्रथम सत्र का संचालन शिल्पी भटनागर (संगोष्ठी संयोजिका ) ने किया| तत्पश्चात दूसरे सत्र में काव्य गोष्ठी आयोजित की गई।उपस्थित रचनाकारों ने विविध विषयों पर काव्य पाठ किया। सभी कवियों ने विविध रसों से सिक्त रचनाएँ सुनाई और माहौल को बहुत खुशनुमा बना दिया। भावना पुरोहित, डॉ सुषमा देवी , विनीता शर्मा , डॉ जयप्रकाश तिवारी (लखनऊ), डॉ रमा द्विवेदी,दीपा कृष्णदीप, संजीव चौधरी (जयपुर रामकिशोर उपाध्याय (दिल्ली ),प्रवीण प्रणव , डॉ सुरभि दत्त ,पूजा महेश (हापुड ) उषा शर्मा, मल्लिका , डॉ आशा मिश्रा , दया शंकर प्रसाद , बिनोद गिरि अनोखा ,शिल्पी भटनागर ने काव्य पाठ किया।अवधेश कुमार सिन्हा , डॉ लावण्या साहित्य ,मोहिनी गुप्ता, डॉ मंजू शर्मा, डॉ गंगाधर वानोडे ,डॉ गोपाल शर्मा , माधव चौसालकर ,नीरज सिन्हा , बाबू राव बालाजी,अजय कुमार पांडेय,राजेश कुमार सिंह ( लखनऊ ) एवं डॉ पी.के जैनसहित 30 लोग क्रार्यक्रम में उपस्थित रहे ।काव्य गोष्ठी का संचालन दीपा कृष्णदीप ने किया।वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सुरभि दत्त (संयुक्त सचिव ) ने आभार ज्ञापित किडा. रमा द्विवेदी / शाखा अध्यक्ष

मैं द्रौपदी नहीं हूं - परिचर्चा संपन्न

``मैं द्रौपदी नहीं हूँ ''पुस्तक परिचर्चा संपन्न -युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच =====================================================...