Wednesday, July 19, 2023

मैं द्रौपदी नहीं हूं : युग बोध का प्रतिबिंबन

संप्रेषण,मानवीय चेतना का अनिवार्य सत्य है जिसे साहित्य के संदर्भ में हम  स्थूल से सूक्ष्म के निरुपण -यात्रा के तहत एक शाश्वत सत्य के रूप में देखते हैं। सत्य है, साहित्य के संदर्भ में यही मानवीय चेतना लघुतम संप्रेषण से संवहित हो अभिव्यक्ति के‌ माध्यम में रुपायित हो लघुकथा का रूप ले‌ लेती है। साहित्य की एक ऐसी स्वतंत्र  सशक्त , संप्रेषित विधा, जो रचना उद्यमिता के अंतर्गत,संवेदना को केंद्र में रखकर, अपने लघु रूप में होने के बावजूद, समकालीन समाज के संपूर्ण यथार्थ में व्याप्त,जीवन मूल्यों को उद्घाटित करने का माद्दा रखती है। कथाकार,रमा द्विवेदी जी की पुस्तक , "मैं द्रौपदी नहीं हूं" इन्ही जीवन मूल्यों के उद्घाटन की अगली कड़ी है। शब्दांकुर प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित,133‌ पृष्ठों के इस  पुस्तक में ,कुल मिलाकर 102 लघुकथाओं का संकलन है । 


मैं  द्रौपदी नहीं हूं, शीर्षक नाम से मुद्रित इस पुस्तक में,द्रौपदी के पौराणिक मिथक में सामाजिक चेतना भरती कहानी की नायिका मिथकीय युग का आह्वान कर , इतिहास के पन्ने को फिर से पलटने के लिए नहीं बल्कि उसमें स्त्री सत्ता के सशक्त निर्णयात्मक भाव का प्रतिनिधित्व कर आधुनिक संदर्भ में उसी इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने को तैयार है। शीर्षक में परिलक्षित यह स्त्री  पुरुष सत्तात्मक समाज के छल‌ बल  को स्वीकार कर  उसके दैहिक साम्राज्य पर पुरूष की गंदी घिनौनी सत्ता को स्वीकार करने को बिल्कुल तैयार‌ नहीं। वह अपनी अस्मिता के लिए पुरुष -तंत्रों की ओर प्रश्नों की लड़ी लिए सिसकती चित्कारती स्त्री नहीं बल्कि, संपूर्ण सशक्तता से समाधान के साथ तैयार‌ खड़ी स्त्री है जो संघर्षों का सामना करने के  लिए तैयार है ,अकेली तैयार है ,पूरी तरह तैयार है । 

अपने मूल‌ में, समसामयिक समाज के यथार्थ -पयोधियों और सरिताओं के कड़वे मीठे, बूंदों को जीवन मूल्यों की गगरी में भरता यह रमा द्विवेदी जी का यह लघुकथा संकलन, समाज के सभी वर्गों में व्याप्त क्षरण को ,फिर चाहें वे पारिवारिक हों या राजनीतिक, सामाजिक हों या धार्मिक या फिर सांस्कृतिक  सभी चेतनाओं के बिखरे -टूटे,खंडित होते प्रतिबिंबों को एक साथ जोड़ने की सफल कोशिश की है। समाज के व्यक्तियों की दायित्वहीनता को केंद्र में रखकर , मानवीय मूल्यों में आई गिरावट,उनके सैद्धांतिक और वैचारिक दृष्टिकोणों में आए अंधेपन की शिथिलता को यूं एक जगह समेटकर ,इतनी सरलता से पाठकों के मध्य‌ रखे इस संकलन की सभी कहानियों में युग चेतना का बोध है। फिर चाहे वह पौराणिक मिथक को सामाजिक चेतना से जोड़ती कहानी , मैं द्रौपदी नहीं हूं हो या फिर साहित्य में व्याप्त बाजारीकरण को उजागर करने के उद्देश्य से लिखी लघुकथा , ठगुआ कवि ,लोभी गुरू लालची चेला ,कविता चोर,सरतार बनिया, नून चबेना  ,संपादक,मूल लेखक कैसे ,रिमार्क हो। सभी युग बोध की अभिव्यक्ति से अभिषिक्त हैं। हालांकि यहां सभी लघुकथाओं को विश्लेषित कर पाना मुश्किल होगा, फिर भी मैं कुछ लघुकथाओं की चर्चा अवश्य करना चाहूंगी।स्त्री विमर्श के केंद्र में लिखी लघुकथा खरीदी हुई औरत ,कागज का पुर्जा,नियति का खेल,अहंकार ,व्रत की विवशता, गिरावट, चिंतन और‌ चुनौती, राज खुल गया यह सभी पित्रसत्तात्मक व्यवस्था के संस्कारों को उद्धृत करते प्रतीत होते हैं। समय की नब्ज को समझतीं,महसूस करतीं और उसे गहराई से थाम कर रखीं इस संकलन की लेखिका, रमा द्विवेदी की अन्य कथाएं यथा ; क्या बताऊं यार, दहशत , धोखे कैसे कैसे जहां एक ओर समसामयिक विवाह संस्था के लिए चुनौती बनी समलैंगिक संस्कृति को पाठकों के समक्ष रखा है तो वहीं समाज के मूल‌ तबके की विकृत मानसिकता को भी बहुत सशक्तता से पटल पर रखा है। विध्वंसकारी पोर्न   समलैंगिक संस्कृति से टूटते रिश्तों के माध्यम से उन्होंने पाठकों को यथार्थोन्मूख बनाने की कोशिश की है। समसामयिक कहानियों की बात करें तो कोरोना संक्रमण को लक्षित कर लिखी लघुकथाएं यथा; श्रृंगार की जरूरत क्या है,कोरोना से प्रश्न काफी महत्वपूर्ण संवाद करते नजर आते हैं। एक्सचेंज मैरिज ,दूल्हे की बोली,नोट-शराब और खाना ,हंसना मना है , मदिरालय खुल गए अपनी अपनी विवशता , ललचाई नजरें और टैगियासुर जैसी सभी लघुकथाओं में आज के समाजिक चेतना की प्रकृति में ह्रास होते संदर्भ दिखाई देते हैं बल्कि क्षणभंगुर उपलब्धयों के लिए बेसब्र होते मानव की मनोवैज्ञानिक विकृतियों का दस्तावेज भी प्रस्तुत होता दिखता है।

कुल मिलाकर देखें तो लेखिका रमा द्विवेदी अपनी इस संकलन की समस्त लघुकथाओं की बुनावट में, न सिर्फ रचना उद्यमिता के उद्देश्यों को लेकर सजग और सतर्क दिखाई देतीं हैं बल्कि वे कथा के अनुसार शिल्पों और‌ भाषाई प्रबंधन में भी एक जिम्मेवार लेखक की भूमिका का निर्वाह करती प्रतीत होतीं हैं ।यही कारण है कि पाठक सरलता से उनकी रचनात्मक तरंगों के साथ प्रवाहित होते चले जातें हैं।विविध विषयों के विभिन्न लघुकथाओं के संप्रेषण और संकलन में ,मानव मूल्यों की पुनर्स्थापना के क्रम में ,लेखिका ,रमा द्विवेदी जी लघुकथा लेखन की चुनौतियों का न सिर्फ बड़ी सावधानी से सामना करती हुईं दिखती हैं बल्कि इनके माध्यम से  सामाजिक चेतना मे विलुप्त होते जीवन मूल्यों को पुनः स्थापित करने हेतु भी प्रयासरत दिखती हैं  । निश्चित रूप से," मैं द्रौपदी नहीं "  मानव मूल्यों को पुनर्स्थापित करने की एक सफल कोशिश है।

उनकी सफल और सशक्त रचनाधर्मिता के लिए हार्दिक शुभकामनाएं

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डॉ.राशि सिन्हा

नवादा, बिहार

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